नवरात्रि 2026 — माँ के नौ रूपों की यात्रा

19 मार्च से 27 मार्च 2026 | चैत्र नवरात्रि

जब भी फाल्गुन की ठंड के बाद चैत्र का महीना आता है, घर में एक अलग ही हलचल होने लगती है। माँ की मूर्ति को नई साड़ी ओढ़ाई जाती है, कलश सजता है, गेंदे के फूल की माला चढ़ती है और जलते हुए घी के दीये की खुशबू पूरे घर में फैल जाती है। दिल में एक अजीब सी शांति आती है और हम जानते हैं — नवरात्रि आ गई!

“नवरात्रि” यह शब्द ही अपने आप में एक पूरी दुनिया है। “नव” यानी नौ, “रात्रि” यानी रातें। ये नौ रातें और नौ दिन माँ आदिशक्ति के नौ रूपों की उपासना के लिए हमारे पूर्वजों ने निर्धारित किए हैं। पूरे वर्ष में चार नवरात्रियाँ होती हैं, लेकिन चैत्र नवरात्रि और शारदीय नवरात्रि सबसे बड़ी और सबसे पवित्र मानी जाती हैं।

2026 की चैत्र नवरात्रि 19 मार्च गुरुवार से शुरू होकर 27 मार्च शुक्रवार को समाप्त होगी। और इस वर्ष एक बड़ा दुर्लभ संयोग है — दुर्गाष्टमी और राम नवमी दोनों 26 मार्च को एक साथ पड़ रही हैं। ऐसा संयोग कई वर्षों में एक बार ही आता है। यानी इस बार माँ दुर्गा और श्री राम दोनों का आशीर्वाद एक ही दिन मिलेगा।


📅 नवरात्रि 2026 — तिथि सारणी

दिनतिथिदिनांकदेवीरंग
पहलाप्रतिपदा19 मार्च, गुरुवारमाँ शैलपुत्रीपीला
दूसराद्वितीया20 मार्च, शुक्रवारमाँ ब्रह्मचारिणीहरा
तीसरातृतीया21 मार्च, शनिवारमाँ चंद्रघंटास्लेटी
चौथाचतुर्थी22 मार्च, रविवारमाँ कूष्माण्डानारंगी
पाँचवाँपंचमी23 मार्च, सोमवारमाँ स्कंदमातासफेद
छठाषष्ठी24 मार्च, मंगलवारमाँ कात्यायनीलाल
सातवाँसप्तमी25 मार्च, बुधवारमाँ कालरात्रिनीला
आठवाँअष्टमी26 मार्च, गुरुवारमाँ महागौरी + राम नवमीगुलाबी
नौवाँनवमी27 मार्च, शुक्रवारमाँ सिद्धिदात्रीबैंगनी

पहला दिन — माँ शैलपुत्री (19 मार्च, गुरुवार)

रंग — पीला | घटस्थापना

नवरात्रि का पहला दिन माँ शैलपुत्री को समर्पित है। “शैल” का अर्थ है पर्वत और “पुत्री” यानी बेटी। अर्थात् पर्वतराज हिमालय की बेटी — यही माँ पार्वती का आदि रूप है।

माँ का स्वरूप — माँ शैलपुत्री नंदी बैल पर सवार हैं। उनके दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल का फूल है। उनका मुखमंडल अत्यंत तेजस्वी और शांत है। सफेद वस्त्र धारण किए, मस्तक पर अर्धचंद्र — यह रूप देखते ही मन में असीम शांति आ जाती है।

पौराणिक कथा — माँ का पिछला जन्म दक्ष प्रजापति की पुत्री “सती” के रूप में हुआ था। जब दक्ष ने एक भव्य यज्ञ आयोजित किया और शिव जी को उसमें आमंत्रित नहीं किया — यह अपमान सती से सहन नहीं हुआ। वे बिना बुलाए ही यज्ञ स्थल पर गईं, लेकिन वहाँ पिता ने शिव जी का घोर अपमान किया। माँ से यह अपमान बर्दाश्त नहीं हुआ और उन्होंने उसी यज्ञकुंड में खुद को अर्पित कर दिया। शिव जी को जब यह पता चला तो उनका क्रोध और दुख अवर्णनीय था।

अगले जन्म में वही सती माँ पर्वतराज हिमालय के घर “शैलपुत्री” के रूप में जन्मीं और पुनः शिव जी को पाने के लिए हजारों वर्ष की कठोर तपस्या की।

घटस्थापना विधि — पहले दिन का सबसे महत्वपूर्ण अनुष्ठान है घटस्थापना। इसे अभिजीत मुहूर्त में करना सबसे शुभ है।

  • एक चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाएं
  • मिट्टी की थाली में मिट्टी रखकर उसमें जौ (barley) के बीज बोएं — ये “जवारे” हैं जो नौ दिन में उगेंगे
  • ताँबे या पीतल के कलश में गंगाजल भरें, उसमें सुपारी, सिक्का, अक्षत, दूर्वा घास डालें
  • कलश के मुँह पर पाँच आम के पत्ते लगाएं, ऊपर नारियल रखें
  • माँ की मूर्ति या चित्र स्थापित करें और अखंड ज्योति जलाएं

जवारों का उगना बहुत शुभ संकेत है — जितने हरे और लंबे जवारे, उतना अच्छा। 27 मार्च को इन्हें नदी में विसर्जित किया जाता है।

भोग — घी, सफेद मिठाई, पेड़ा, पंचामृत, केला

मंत्र:

वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्। वृषभारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्॥

आज का रंग पीला क्यों? — पीला रंग सूर्य की तरह ऊर्जा, खुशी और समृद्धि का प्रतीक है। माँ शैलपुत्री की आभा भी सोने जैसी है — इसलिए आज पीले वस्त्र पहनना शुभ है।


दूसरा दिन — माँ ब्रह्मचारिणी (20 मार्च, शुक्रवार)

रंग — हरा | तपस्या और साधना

दूसरे दिन माँ ब्रह्मचारिणी की उपासना होती है। “ब्रह्म” यानी तपस्या और “चारिणी” यानी आचरण करने वाली। यह माँ का वह रूप है जब उन्होंने शिव जी को पति रूप में पाने के लिए अनेकों वर्षों की अत्यंत कठोर साधना की।

माँ का स्वरूप — माँ ब्रह्मचारिणी श्वेत वस्त्रों में, नंगे पाँव, सिर पर जटा-जूट बाँधे, हाथ में जल का कमण्डल और जाप की माला लिए हुई हैं। इनका रूप अत्यंत शांत, तेजस्वी और साधनामय है। इनके चेहरे पर कोई आभूषण नहीं — केवल तपस्या का तेज है।

पौराणिक कथा — नारद जी की सलाह पर माँ पार्वती ने शिव जी को पाने के लिए घोर तपस्या शुरू की। यह तपस्या हजारों वर्षों तक चली और बेहद कठोर थी। पहले एक हजार वर्ष तक माँ ने केवल फल-फूल खाए। फिर कुछ वर्ष सूखे पत्ते खाए। फिर केवल पानी पर जीवित रहीं। और अंत में निराहार रहकर खुले आकाश के नीचे कठोर तपस्या की। गर्मी में पंचाग्नि के बीच और सर्दी में बर्फ पर ध्यान में बैठी रहीं।

इतनी कठोर साधना देखकर तीनों लोकों में हाहाकार मच गया। देवता भी घबरा गए। एक बार माँ के पिता हिमालय और देवर्षि नारद ने उन्हें समझाने की कोशिश की — “छोड़ दो यह तपस्या।” लेकिन माँ टस से मस नहीं हुईं। इसी तपस्या के कारण इनका नाम “तपश्चारिणी” भी पड़ा। जब माँ ने पत्ते खाना भी छोड़ दिया तो देवताओं ने उन्हें “अपर्णा” कहना शुरू किया — जिसने पत्ता भी न खाया।

इस दिन का संदेश — माँ ब्रह्मचारिणी हमें सिखाती हैं कि जीवन में धैर्य और संकल्प से हर लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है। जो लोग किसी कठिनाई से गुज़र रहे हैं, किसी परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं, या किसी बड़े लक्ष्य की ओर बढ़ रहे हैं — उनके लिए यह दिन विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। माँ की कृपा से मन में दृढ़ता और एकाग्रता आती है।

आज कम से कम 10 मिनट का ध्यान करें — आँखें बंद करें, माँ ब्रह्मचारिणी का ध्यान करें और उनसे संकल्प और धैर्य माँगें।

भोग — मिश्री या शक्कर, पंचामृत, तुलसी पत्र

मंत्र:

दधाना कर पद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू। देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा॥

आज का रंग हरा क्यों? — हरा रंग विकास, संतुलन और नई ऊर्जा का प्रतीक है। माँ की तपस्या ने प्रकृति को भी प्रभावित किया — वनस्पतियाँ और पेड़-पौधे उनकी साधना की साक्षी रहे।


तीसरा दिन — माँ चंद्रघंटा (21 मार्च, शनिवार)

रंग — स्लेटी | वीरता और शांति

तीसरे दिन माँ चंद्रघंटा की पूजा होती है। इनके माथे पर अर्धचंद्र है जिसका आकार घंटी जैसा है — इसीलिए इनका नाम “चंद्रघंटा” पड़ा। इनकी घंटी की ध्वनि इतनी प्रचंड है कि दुष्टों के प्राण काँप उठते हैं।

माँ का स्वरूप — माँ चंद्रघंटा शेरनी पर सवार हैं। दस भुजाओं में खड्ग, त्रिशूल, गदा, धनुष, बाण, कमंडल, कमल और अन्य अस्त्र-शस्त्र लिए हैं। तीसरी आँख हमेशा खुली रहती है — यह दिव्यदृष्टि का प्रतीक है। माँ का रंग स्वर्णिम है और वे सदैव युद्ध के लिए तत्पर दिखती हैं। लेकिन भक्तों के लिए इनका मुखमंडल अत्यंत शांत और करुणामय है।

पौराणिक महत्व — यह माँ पार्वती का विवाहित रूप है। जब शिव जी और माँ पार्वती का विवाह हुआ, तो शिव जी एक विचित्र बरात लेकर आए थे — भूत, पिशाच, जटाधारी सन्यासी। माँ पार्वती ने इसे देखकर अपना रूप बदला और चंद्रघंटा का स्वरूप धारण किया। माथे पर अर्धचंद्र सजाया। जब दुष्ट राक्षस देवताओं को सताते हैं, माँ चंद्रघंटा की घंटी की ध्वनि मात्र से उनका विनाश हो जाता है।

इस दिन क्या करें? — आज घर में घंटी बजाकर माँ को जगाएं। हर कमरे में थोड़ा गंगाजल छिड़कें — इससे घर की नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है। आज घर की विशेष सफाई करें, पुरानी और टूटी हुई चीज़ें हटाएं। माँ चंद्रघंटा को स्वच्छता अत्यंत प्रिय है। जो लोग जीवन में भय, चिंता या किसी बुरी शक्ति के प्रभाव से पीड़ित हों, उनके लिए यह दिन बहुत महत्वपूर्ण है।

भोग — दूध की खीर, रबड़ी, चमेली या मोगरे के फूल, घी का दीपक

मंत्र:

पिण्डज प्रवरारूढ़ा चण्डकोपास्त्रकैर्युता। प्रसादं तनुते महयं चंद्रघण्टेति विश्रुता॥

आज का रंग स्लेटी क्यों? — स्लेटी रंग माँ चंद्रघंटा की दोहरी शक्ति का प्रतीक है — एक तरफ वीरता और उग्रता, दूसरी तरफ शांति और संतुलन। यह रंग परिपक्वता और गहराई को दर्शाता है।


चौथा दिन — माँ कूष्माण्डा (22 मार्च, रविवार)

रंग — नारंगी | सृष्टि की रचयिता

चौथे दिन माँ कूष्माण्डा की आराधना होती है। “कू” यानी छोटा, “उष्मा” यानी ऊर्जा और “अण्ड” यानी ब्रह्माण्डीय अंडा — इन तीनों से मिलकर बना है “कूष्माण्डा।” माँ का यह नाम ही उनकी अपार शक्ति को बताता है।

माँ का स्वरूप — माँ कूष्माण्डा अष्टभुजा हैं — आठ भुजाओं में कमंडल, धनुष, बाण, कमल का फूल, अमृत से भरा कलश, चक्र, गदा और जपमाला है। माँ शेरनी पर सवार हैं और सूर्यमंडल के बीच में विराजमान हैं। इनका तेज बाकी सब को ढँक लेता है — पूरे ब्रह्माण्ड में इनसे अधिक तेजस्वी कोई नहीं।

पौराणिक महत्व — जब सृष्टि का कोई अस्तित्व नहीं था, चारों तरफ घना अंधेरा था और कहीं कुछ नहीं था — उस समय माँ कूष्माण्डा ने अपनी हल्की सी दिव्य मुस्कान से इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की रचना की। ये ही आदिशक्ति हैं जिन्होंने सूर्य, चंद्र, तारे, ग्रह — सब कुछ बनाया। कहते हैं कि सूर्य की जो ऊर्जा है, वह माँ कूष्माण्डा की ही कृपा से है। इसीलिए ये सूर्यमंडल में निवास करती हैं और सूर्य की असह्य गर्मी को भी सहन कर सकती हैं।

इस दिन का विशेष महत्व — जो लोग किसी नई शुरुआत करना चाहते हैं — नया व्यवसाय, नया घर, नई नौकरी, नई पढ़ाई — उनके लिए यह दिन सर्वोत्तम है। माँ कूष्माण्डा नई शुरुआत को सफल बनाती हैं। आज सूर्योदय के समय माँ की पूजा करें, उगते सूरज को जल अर्पित करें और अपनी मनोकामना माँगें।

माँ की उपासना से बुद्धि, विवेक, यश, बल और दीर्घायु की प्राप्ति होती है। जो भक्त नियमित रूप से इनकी पूजा करते हैं उन्हें रोग और शोक से मुक्ति मिलती है।

भोग — मालपुआ, हलवा, नारियल का प्रसाद, पंचमेवा, कद्दू से बनी मिठाई

मंत्र:

सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च। दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे॥

आज का रंग नारंगी क्यों? — नारंगी रंग रचनात्मकता, उत्साह और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है — बिल्कुल माँ कूष्माण्डा की सृजन शक्ति की तरह।


पाँचवाँ दिन — माँ स्कंदमाता (23 मार्च, सोमवार)

रंग — सफेद | मातृत्व की पावन देवी

पाँचवें दिन माँ स्कंदमाता की पूजा होती है। “स्कंद” यानी कार्तिकेय और “माता” यानी माँ। यह माँ का वह रूप है जब वे अपने प्यारे शिशु कार्तिकेय को गोद में लिए कमल पर बैठी हैं — इससे सुंदर कोई स्वरूप नहीं।

माँ का स्वरूप — माँ स्कंदमाता कमल के आसन पर विराजमान हैं — इसीलिए इन्हें “पद्मासना देवी” भी कहते हैं। चार भुजाओं में से दो में कमल, एक हाथ में अपना पुत्र कार्तिकेय और एक हाथ अभय मुद्रा में है। माँ का रंग शुभ्र श्वेत है — जैसे दूध की धवलता। शेरनी भी इनका वाहन है। माँ के मुख पर एक ममतामय मुस्कान है जो किसी भी सच्चे भक्त का दिल पिघला दे।

पौराणिक कथा — जब देवताओं पर तारकासुर का अत्याचार बढ़ गया, तब ब्रह्मा जी ने कहा कि केवल शिव-पार्वती का पुत्र ही तारकासुर का वध कर सकता है। तब देवताओं ने माँ पार्वती से प्रार्थना की। माँ पार्वती ने कार्तिकेय को जन्म दिया जो आगे चलकर देवताओं के सेनापति बने और तारकासुर का नाश किया। माँ स्कंदमाता उस करुणा और ममता की प्रतीक हैं जो एक माँ अपने बच्चे के लिए महसूस करती है।

इस दिन का विशेष संदेश — आज अपनी माँ के पाँव छुएं और उनका आशीर्वाद लें। जो स्त्रियाँ संतान की कामना रखती हैं उनके लिए यह दिन अत्यंत महत्वपूर्ण है। माँ स्कंदमाता की उपासना से संतान प्राप्ति होती है, संतान स्वस्थ और बुद्धिमान होती है।

माँ स्कंदमाता की यह विशेषता भी है कि जो भक्त इनकी उपासना करता है, उसे स्वतः ही कार्तिकेय का भी आशीर्वाद मिल जाता है।

भोग — केला, श्वेत मिठाई, रबड़ी, खीर, चमेली और बेला के सफेद फूल

मंत्र:

सिंहासनगता नित्यं पद्माञ्चित करद्वया। शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी॥

आज का रंग सफेद क्यों? — सफेद रंग पवित्रता, निर्मलता और माँ के उस असीमित प्रेम का प्रतीक है जो किसी शर्त के बिना, बिना किसी स्वार्थ के बस बहता रहता है।


छठा दिन — माँ कात्यायनी (24 मार्च, मंगलवार)

रंग — लाल | महिषासुरमर्दिनी

छठे दिन माँ कात्यायनी की उपासना होती है। यह माँ दुर्गा का वह रूप है जिसे जन-जन जानता है — महिषासुर का नाश करने वाली, सबसे शक्तिशाली और सबसे पूजित।

माँ का स्वरूप — माँ कात्यायनी शेरनी पर सवार हैं। चार भुजाओं में खड्ग, कमल, अभय मुद्रा और वर मुद्रा है। इनका वर्ण स्वर्णिम है। इनके तीन नेत्र हैं। माँ का यह रूप देखने में जितना उग्र है, भक्तों के लिए उतना ही करुणामय भी है।

पौराणिक कथा — महिषासुर नामक राक्षस ने ब्रह्मा जी से यह वरदान पाया था कि कोई देवता या मानव उसे मार न सके। इस वरदान के घमंड में उसने तीनों लोकों में तांडव मचा दिया। इंद्र सहित सभी देवता उससे हार गए और स्वर्ग भी उन्हें छोड़ना पड़ा। तब सभी देवताओं के क्रोध और शक्ति से एक महाशक्ति प्रकट हुई — माँ दुर्गा। सभी देवताओं ने अपने-अपने अस्त्र माँ को भेंट किए।

9 दिनों तक भीषण युद्ध हुआ। महिषासुर बार-बार अपना रूप बदलता रहा — कभी भैंसा, कभी सिंह, कभी हाथी। लेकिन माँ ने हर रूप को पराजित किया और अंततः महिषासुर का वध किया। इसीलिए माँ को “महिषासुरमर्दिनी” कहते हैं।

ऋषि कात्यायन की घोर तपस्या से प्रसन्न होकर माँ ने उनके यहाँ पुत्री रूप में जन्म लिया और उनके नाम पर “कात्यायनी” कहलाईं।

इस दिन का विशेष महत्व — श्रीमद्भागवत में उल्लेख है कि वृंदावन की गोपियों ने कात्यायनी व्रत करके श्रीकृष्ण को पति रूप में प्राप्त करने की प्रार्थना की थी। इसी कारण जो कन्याएं विवाह की कामना रखती हैं, वे इस दिन माँ कात्यायनी की विशेष पूजा करती हैं।

आज दुर्गा सप्तशती का पाठ अवश्य करें, विशेष रूप से महिषासुरमर्दिनी स्तोत्र। यदि संभव हो तो हवन करें।

भोग — शहद, लाल फूल — गुलाब, गेंदा, पान-सुपारी, गुलाब जामुन

मंत्र:

चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना। कात्यायनी शुभं दद्याद् देवी दानवघातिनी॥

आज का रंग लाल क्यों? — लाल रंग शक्ति, साहस, विजय और असुरों के रक्त का प्रतीक है। माँ कात्यायनी की ऊर्जा ही लाल रंग में बसी है।


सातवाँ दिन — माँ कालरात्रि (25 मार्च, बुधवार)

रंग — नीला | अंधकार का नाश

सातवें दिन माँ कालरात्रि की उपासना होती है। यह माँ दुर्गा का सबसे उग्र और भयंकर दिखने वाला रूप है। पहली बार देखने पर डर लगे, लेकिन असल में यह रूप भक्तों का सबसे बड़ा रक्षक है।

माँ का स्वरूप — माँ कालरात्रि का वर्ण घने अंधेरे जैसा काला है। बाल बिखरे हुए हैं। गले में विद्युत की माला है। 3 आँखें हैं जो सूर्य, चंद्र और अग्नि की तरह चमकती हैं। नाक से आग की लपटें निकलती हैं। गधे पर सवार हैं। चार भुजाओं में खड्ग, लौह शस्त्र, अभय और वर मुद्रा है।

यह रूप देखने में जितना भयंकर है, माँ का ह्रदय उतना ही कोमल है। दुष्टों को इनसे भय लगता है, लेकिन अपने सच्चे भक्तों की ये हमेशा रक्षा करती हैं। इसीलिए इन्हें “शुभंकरी” भी कहते हैं — जो भक्तों का सदैव शुभ करती हैं।

पौराणिक कथा — जब शुंभ-निशुंभ और रक्तबीज जैसे महाराक्षसों ने देवताओं को हराया, तब माँ दुर्गा ने कालरात्रि का रूप धारण किया। रक्तबीज की यह विशेषता थी कि उसके रक्त की हर बूँद से एक नया रक्तबीज पैदा हो जाता था। माँ कालरात्रि ने उसका रक्त ज़मीन पर गिरने से पहले ही पी लिया और इस प्रकार उसका वध किया।

इस दिन का विशेष महत्व — जो लोग तंत्र-मंत्र के प्रभाव, बुरी आत्माओं, अज्ञात भय या किसी गहरी नकारात्मक ऊर्जा से पीड़ित हों — उनके लिए यह दिन अत्यंत महत्वपूर्ण है। माँ कालरात्रि की उपासना से सभी बुरी शक्तियाँ नष्ट होती हैं।

आज रात को एक दीपक जलाकर माँ के सामने बैठें। काले तिल और गुड़ का भोग लगाएं। मन की सभी पीड़ाएं, सभी भय, सभी चिंताएं माँ के सामने खुलकर रखें — माँ सुनती हैं।

भोग — गुड़ और काले तिल, नीले या बैंगनी फूल, लौंग-इलायची वाली मिठाई, काले चने

मंत्र:

एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता। लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी॥

आज का रंग नीला क्यों? — गहरा नीला रंग विशालता, गहराई और उस अनंत अंधकार का प्रतीक है जिसे माँ कालरात्रि का तेज नष्ट करता है।


आठवाँ दिन — माँ महागौरी (26 मार्च, गुरुवार) ⭐

रंग — गुलाबी | 2026 विशेष — दुर्गाष्टमी + राम नवमी एक साथ!

आठवें दिन माँ महागौरी की पूजा होती है। यह नवरात्रि का सबसे महत्वपूर्ण दिन है — और 2026 में यह और भी विशेष है क्योंकि इसी दिन राम नवमी भी पड़ रही है। माँ दुर्गा और श्री राम दोनों का एक साथ आशीर्वाद — यह दुर्लभ संयोग है।

माँ का स्वरूप — माँ महागौरी का वर्ण चाँद से भी अधिक उज्ज्वल और गोरा है। “महागौरी” यानी अत्यंत गौर वर्ण की। श्वेत वस्त्र, श्वेत आभूषण — माँ का पूरा स्वरूप सफेद है जो पवित्रता की पराकाष्ठा है। वृषभ पर सवार, चार भुजाओं में त्रिशूल, डमरू, अभय और वर मुद्रा है।

पौराणिक कथा — जब माँ पार्वती ने शिव जी के लिए घोर तपस्या की, कठोर साधना में उनका रंग काला पड़ गया था। जब शिव जी ने माँ की तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हें अपनाया और गंगाजल से उनका अभिषेक किया — तो माँ पुनः अत्यंत गौर वर्ण की हो गईं। इतनी गोरी कि सारे देवता चकित रह गए। तभी से ये “महागौरी” कहलाईं।

माँ महागौरी की उपासना से सभी पाप धुल जाते हैं। जिनके जीवन में कोई कलंक या पछतावा हो, जिन्होंने जाने-अनजाने में कोई गलती की हो — माँ महागौरी की पूजा से वे निर्मल और शुद्ध हो जाते हैं।

कन्या पूजन — नवरात्रि का सबसे पवित्र अनुष्ठान — अष्टमी के दिन कन्या पूजन किया जाता है। 2 से 10 वर्ष की 9 कन्याओं को घर बुलाएं। उन्हें चौकी पर बिठाएं, उनके पाँव धोएं, माथे पर तिलक लगाएं, लाल चुनरी ओढ़ाएं — ये 9 कन्याएं नवदुर्गा का साक्षात रूप हैं। उन्हें हलवा, पूरी, काले चने, फल, मिठाई खिलाएं। नए वस्त्र, चूड़ियाँ और दक्षिणा दें। अंत में उनके पाँव छुएं।

जब ये नन्हीं देवियाँ खाकर खिलखिलाती हैं, उस पल में माँ दुर्गा वास्तव में उनमें प्रकट होती हैं। यह अनुभव शब्दों में नहीं बताया जा सकता।

भोग — हलवा-पूरी-काले चने, नारियल, नारियल के लड्डू, गुलाबी मिठाई

मंत्र:

श्वेते वृषेसमारूढा श्वेताम्बरधरा शुचिः। महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा॥

आज का रंग गुलाबी क्यों? — गुलाबी रंग प्रेम, करुणा, कोमलता और शुद्धता का प्रतीक है — बिल्कुल माँ महागौरी के स्वभाव की तरह।


नौवाँ दिन — माँ सिद्धिदात्री (27 मार्च, शुक्रवार)

रंग — बैंगनी | नवरात्रि का भव्य समापन

नवरात्रि के अंतिम दिन माँ सिद्धिदात्री की पूजा होती है। “सिद्धि” यानी अलौकिक शक्तियाँ और “दात्री” यानी देने वाली। यह माँ का वह रूप है जो जो माँगो वह देती हैं।

माँ का स्वरूप — माँ सिद्धिदात्री कमल के आसन पर विराजमान हैं। चार भुजाओं में गदा, चक्र, शंख और कमल का फूल है। माँ की मुस्कान ऐसी है जो देखते ही सारी पीड़ाएं गायब हो जाएं।

पौराणिक महत्व — पौराणिक मान्यता के अनुसार सृष्टि के आरंभ में स्वयं भगवान शिव ने माँ सिद्धिदात्री की उपासना की थी। माँ ने प्रसन्न होकर शिव जी को 8 प्रकार की सिद्धियाँ प्रदान कीं — अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व। इन्हीं सिद्धियों से शिव जी “अर्धनारीश्वर” बने — उनके शरीर का आधा भाग माँ सिद्धिदात्री बन गया।

देवता, गंधर्व, यक्ष, ऋषि-मुनि — सभी माँ सिद्धिदात्री की उपासना करते हैं।

नवरात्रि समापन की विधि —

हवन — नवमी के दिन हवन करना अत्यंत शुभ है। छोटा हवन कुंड रखकर आम की लकड़ी, घी, काले तिल, जौ और हवन सामग्री से यज्ञ करें। हर आहुति के साथ “स्वाहा” बोलें। हवन से घर में नकारात्मक ऊर्जा नष्ट होती है और दिव्य ऊर्जा का संचार होता है।

जवारा विसर्जन — 19 मार्च को जो जौ बोए थे, वे अब हरे-हरे पौधे बन गए होंगे। इन जवारों को नदी, तालाब या बगीचे में विसर्जित करें।

व्रत पारण — अंत में माँ को नैवेद्य अर्पित करें, प्रसाद लेकर खीर, हलवा या दही-चूरमा से व्रत तोड़ें। माँ का हृदय से धन्यवाद करें।

भोग — खीर, पंजीरी, नारियल, मेवे, बैंगनी अंगूर, पंचामृत

मंत्र:

सिद्धगन्धर्वयक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि। सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी॥

आज का रंग बैंगनी क्यों? — बैंगनी रंग आध्यात्मिक ज्ञान, गहरी अंतर्दृष्टि और दिव्यता का प्रतीक है — नवरात्रि के अंत में यही सब माँ हमें देती हैं।


🪔 पूजा विधि — सम्पूर्ण जानकारी

प्रतिदिन की पूजा दिनचर्या

पहले स्नान करें, उस दिन के रंग के शुद्ध वस्त्र पहनें। पूजा की थाली सजाएं — उसमें रोली, अक्षत, फूल, दीपक, अगरबत्ती और भोग रखें।

माँ की मूर्ति को पंचामृत से स्नान कराएं — पहले दूध, फिर दही, फिर घी, फिर शहद, अंत में शक्कर-मिश्रित जल। इसके बाद गंगाजल से साफ करें। नए वस्त्र और चुनरी ओढ़ाएं। माथे पर सिंदूर का टीका, बिंदी, ताज़े फूलों की माला चढ़ाएं।

धूप-दीप जलाएं। अखंड ज्योति की जाँच करें। उस दिन की देवी का ध्यान मंत्र 108 बार जपें। दुर्गा चालीसा या देवी कवच का पाठ करें। भोग अर्पित करें। घंटी और शंख बजाते हुए आरती करें। माँ की 3 परिक्रमा करें। प्रसाद ग्रहण करें और परिवार-पड़ोसियों में बाँटें।

शाम को फिर से दीपक जलाएं, आरती करें, माँ के सामने कुछ देर बैठें।


पूजा सामग्री सूची

ताँबे या पीतल का कलश, गंगाजल, जौ के बीज, मिट्टी की थाली, आम के पत्ते (5 या 7), नारियल, लाल या पीला कपड़ा, माँ दुर्गा की मूर्ति या चित्र, रोली और सिंदूर, अक्षत, मोली, सुपारी और सिक्का, दूर्वा घास, पंचामृत सामग्री, घी का दीपक, कपूर और अगरबत्ती, जपमाला, ताज़े फूल, सेंधा नमक, तुलसी पत्र।


कन्या पूजन विधि

2 से 10 वर्ष की 9 कन्याओं को बुलाएं, साथ में 1 बालक भी। कन्याओं को आसन पर बैठाएं, गर्म पानी में दूध मिलाकर पाँव धोएं। माथे पर रोली का तिलक, बिंदी, माला और लाल चुनरी ओढ़ाएं। हलवा, पूरी, काले चने, खीर और फल परोसें। नए वस्त्र, चूड़ियाँ और दक्षिणा दें। अंत में पाँव छुएं और आशीर्वाद लें।


व्रत में क्या खाएं, क्या नहीं

खाएं — साबूदाना, कुट्टू का आटा, सिंघाड़े का आटा, मखाने, आलू, शकरकंद, सभी फल, दूध-दही-पनीर, मेवे, नारियल पानी, राजगिरा, शहद, गुड़, मिश्री। केवल सेंधा नमक ही उपयोग करें।

न खाएं — गेहूँ-चावल-मैदा, सभी दालें, प्याज-लहसुन, माँस-मछली-अंडा, शराब, सामान्य नमक, राई-सरसों, बाहर का जंक फूड, बासा खाना।

व्रत के मुख्य नियम — मन-वचन-कर्म से संयम रखें। क्रोध, झूठ और निंदा से बचें। यदि स्वास्थ्य ठीक न हो तो व्रत न रखें — माँ की पूजा व्रत से भी बड़ी है।


नवरात्रि केवल एक त्योहार नहीं है — यह एक अवसर है। खुद को माँ के सामने खोलने का, सारे बोझ उनके चरणों में रखने का, और यह महसूस करने का कि इस दुनिया में हम अकेले नहीं हैं।

माँ दुर्गा की कृपा आप सभी पर हो। यह नवरात्रि आपके जीवन में सुख, शांति, स्वास्थ्य और समृद्धि लाए।

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